4 year graduation at DU

SAVE DELHI UNIVERSITY! दिल्ली विश्वविद्यालय को बचाओ! Critiques of the 4 year graduation, Press Reports, Campaign info

दिल्ली विश्वविद्यालय और आनेवाली पीढ़ियों को तबाही से बचाएं!

कई निकास बिंदुओं वाला 4 वर्षीय बैकलॉरिएट कार्यक्रम क्यों?!

SignPetitionBackgroundडीयू में जुलाई 2013 से 3-वर्षीय बीए/बीएससी कोर्स को ख़त्म करके एक 4- वर्षीय पाठ्यक्रम लागू करने की तैयारी चल रही है। जहां दूसरे विश्वविद्यालयों के विद्यार्थी तीन साल में ऑनर्स की डिग्री हासिल कर पाएंगे, वहीं डीयू के विद्यार्थियों को अब से ऑनर्स डिग्री के लिए एक साल और पढ़ना पड़ेगा। क्यों? क्या वे इस एक साल में कुछ ज़्यादा सीख लेंगे? बिल्कुल नहीं! यह अतिरिक्त साल 11 अनिवार्य फांउडेसन कोर्सको समर्पित है, जो अंग्रेज़ी, हिंदी, गणित, विज्ञान, कॉमर्स, इतिहास, राजनीतिशास्त्र, मनोविज्ञान, भूगोल इत्यादि से संबंधित होंगे। हर विद्यार्थी - वह चाहे आर्ट्स का हो, चाहे विज्ञान या कॉमर्स का - उसे ये सभी ग्यारह कोर्स पढ़ने ही होंगे और पहले दो सालों में ये निपटाएं जाएंगे! लिहाज़ा ये कोर्स बहुत ही चलताऊ क़िस्म के होंगे और इनमें स्कूली स्तर की चीज़ों का ही दुहराव भर होगा। दूसरी स्ट्रीम से आए विद्यार्थियों के लिए वे या तो बहुत उबाऊ होंगे या बेहद मुश्किल।

कुलपति का दावा है कि यह कार्यक्रम विद्यार्थियों के सामने चुनाव के लिए अधिक विकल्प पेश करेगा। असलियत क्या है? सभी स्ट्रीम्स को मिलाकर पहले से मौजूद चयन-विकल्पों को ख़त्म कर दिया गया है और अनिवार्य कोर्सों की संख्या बढ़ा दी गई हैं। एक ही च्वाइसहै कि विद्यार्थी 2 (या 3) साल बाद एक कमतर गुणवत्ता वाली डिग्री और रोज़गार की कमतर संभावनाओं के साथ इससे बाहर निकल सकते हैं। ज़्यादातर विद्यार्थी स्वेच्छा से नहीं, बल्कि फ़ीस की बढ़त और फांउडेसन कोर्स की मुश्किल की वजह से कोर्स पूरा नहीं कर पाएंगे।

इतनी जल्दबाजी क्यों: दाखिले, टाइमटेबुल और इम्तहानों में पूरी अराजकता

placard9विभागों को 5.3.2013 को यह आदेश दिया गया कि वे दो सप्ताह के भीतर इस नये कोर्स ढांचे के लिए सिलेबस बनाएं! अभी तक इन बातों को लेकर कोई सफ़ाई नहीं है कि क्लास का आकार क्या होगा, दाखि़ले की प्रक्रिया क्या होगी, उस अतिरिक्त साल की क्लासें कहां लगेंगी? साल में दो बार इम्तहान होने से परीक्षा-व्यवस्था पहले से ही भयंकर अव्यवस्था की शिकार है। अंक मनमाने ढंग से बढ़ाए जा रहे हैं, अंकपत्र पर कुल अंक से अधिक प्राप्तांक मिलने लगे हैं (मिसाल के लिए 100 में से 102)। कई स्नातकोत्तर कोर्सों में फेल होनेवालों की संख्या बढ़ी है। क्या यह बड़े बदलावों को अंजाम देने का ज़िम्मेदार तरीक़ा है? इसकी वजह से क्या दिल्ली विश्वविद्यालय की डिग्री का महत्त्व कम नहीं होगा?

शिक्षकों की ज़बरदस्त कमी

placard8अभी 4000 से ज़्यादा शिक्षक पद (50 प्रतिशत) ख़ाली पड़े हैं। इन जगहों पर जो एडहॉक और गेस्ट शिक्षक पढ़ाते हैं, वे अक्सर एक सेमेस्टर में नौकरी पर होते हैं और अगले सेमेस्टर बाहर। लगातार अधिक नियमित रोज़गार पाने की चिंता उन्हें सताती है और वे विद्यार्थियों के साथ अधिक स्थायी क़िस्म का रिश्ता विकसित नहीं कर पाते। दूसरी ओर कुलपति ने किसी भी बड़े बदलाव से पहले रिक्त पदों को भरने की अपीलों को अनसुना कर दिया है। पूरी तरह से एक नये कोर्स का ढांचा सिर्फ़ 50 फ़ीसद नियमित शिक्षकों के साथ कैसे लागू किया जा सकता है?

आखिर ये सुधारक्योंअब तक इनसे क्या मिला है?

Placard7smallतथाकथित सुधारोंके ख़िलाफ हमारा संघर्ष तब शुरू हुआ जब स्नातक कार्यक्रमों पर सेमेस्टर प्रणाली थोपी गई। इसने गहन अध्ययन की तमाम संभावनाओं पर ग्रहण लगा दिया। शिक्षक और विद्यार्थी अब हमेशा इम्तहान के ख़याल से सिलेबस को निपटाने की अफ़रातफ़री में लगे रहते हैं। इसने खेलकूद और अन्य पाठ्येतर गतिविधियों के लिए समय ही नहीं रहने दिया। पाठ्य-सामग्री बहुत ही अपर्याप्त हैं, ख़ास तौर से हिंदी में। साल में दो इम्तहानों के बोझ ने परीक्षा-तंत्र को पूरी तरह चरमरा दिया है। विद्यार्थी न तो अधिक अंक हासिल करने का तर्क समझ पाते हैं, न कम अंक हासिल करने का। पुनर्मूल्यांकन की फ़ीस बढ़ा दी गई है और बाद की किसी तिथि में कुछ पर्चे पूरा करने के विषेश चांसकी सुविधा ख़त्म कर दी गई है।

अब 4- वर्षीय कोर्स तो और हड़बड़ी में थोपा जा रहा है। यह मॉडल अमेरिका से आयातित है। अमेरिका की ही तरह, जिनकी आर्थिक हैसियत होगी, वे ही 4 साल पूरे कर पाएंगे! लेकिन अमेरिका की तरह यहां सचमुच के चयन-विकल्प नहीं होंगे।

विद्यार्थी एक अच्छे भविष्य की तलाश में डीयू आते हैं। कुलपति के ये सुधारशिक्षा की गुणवत्ता और विद्यार्थियों की उन उम्मीदों पर लटकती हुई तलवार की तरह हैं। ग़ौर करें तो यह एक ज़्यादा बड़ी योजना का हिस्सा हैसरकारी स्कूल और अस्पतालों के साथ जो हुआ, वही अब उच्च शिक्षा के साथ हो रहा है। जब सरकारी खर्चे पर चलनेवाले विश्वविद्यालय को सिलसिलेवार ढंग से ख़त्म किया जाएगा, तभी तो विदेशी और निजी विश्वविद्यालय फूले-फलेंगे!

अभिभावक, विद्यार्थी और सजग नागरिक के रूप में हमारे संघर्ष को समर्थन दें और उसमें शामिल हों!


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One comment on “दिल्ली विश्वविद्यालय और आनेवाली पीढ़ियों को तबाही से बचाएं!

  1. Akshay kumar meena
    April 6, 2013

    It is not practical convention it will totaly eradicate the think tank of the students and make dem machines which only run for numbers…

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